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जायंतेय गीता | Jāyantēya Gītā — Part 1 of 4

Jāyantēya Gītā means the song of the sons of Jayantī. Jayantī and Ṛṣabhadēva gave birth to King Bharata, in whose honour India is still called Bhārata today. This couple also had nine other sons, called nava-yōgēndra-s who instructed Bhāgavata-dharma (the Dharma of devotional service) to King Nimi (aka King Videha). This episode is described in Śrīmad Bhāgavatam Canto 11, chapters 2–5.

स्वायंभुव मनु का पुत्र प्रियव्रत का पुत्र आग्नीध्र का पुत्र नाभी का पुत्र ऋषभदेव थे । ऋषभदेव और जयंती ने नौ पुत्रों को जन्म दिये — कवि, हविर, अन्तरीक्षा, प्रबुद्ध, पिप्पलायन, आविर्होत्र, द्रुमिळा, चमस तथा करभाजन । एक बार इन नव-योगेंद्रों ने राजा निमि को भागवतधर्म के बारे में बोधन किये । जैसे आप अनुमान लगा सकते है, इस प्रसंग श्रीमद् भागवत के ११-वे स्कंध के २-५ अध्यायों मे आता है ।

इस भाग में द्वितीयवे अध्याय के कुछ प्रमुख श्लोकों का अनुवाद करने का प्रयत्न किया हूँ । यदि कोई दोष है तो मुझे संपर्क कीजिए । इस भागवतधर्म को स्वयं भगवान ही प्रस्तापित किया है (११-२-३४) । इस संवाद का आरंभ महाराजा निमि से करेंगे ।

   विदेह उवाच
दुर्लभो मानुषो देहो देहिनां क्षणभङ्गुरः ।
तत्रापि दुर्लभं मन्ये वैकुण्ठप्रियदर्शनम् ॥ ११-२-२९ ॥

राजा विदेह (निमि) ने योगेंद्रों से कहा — हर देही (जीवी) के लिए इस मनुष्य जनम दुर्लभ है । एक क्षण मात्र में नष्ट हो सकता है । मैं मानता हूं कि उनमें से वैकुण्ठलोक के अर्ह लोग और भी दुर्लभ है ।

धर्मान् भागवतान् ब्रूत यदि नः श्रुतये क्षमम् ।
यैः प्रसन्नः प्रपन्नाय दास्यत्यात्मानमप्यजः ॥ ११-२-३१ ॥

यदि आप मुझे योग्य मानते हैं तो उस भागवत धर्म के बारे में सुनना चाहता हूँ । वह जन्मरहित भगवान ही उस भक्त का दास बन जाता है जो अपने में शरण लेता है ।

इस श्लोक मे “प्रपन्न” शब्द महत्वपूर्ण है । इसका अर्थ है कि दीन भाव से भगवान का शरण लेना ।

   कविरुवाच
मन्येऽकुतश्चिद् भयमच्युतस्य पादामुजोपासनमत्र नित्यम् ।
उद्विग्नबुद्धेः असदात्मभावाद् विश्वात्मना यत्र निवर्तते भीः ॥ ११-२-३३ ॥

योगेंद्र कविजी ने कहे: मैं मानता हूँ कि जो विचलित बुद्धि से — “मेरे आत्मा ही इस विश्व का आत्मा है” — सोचते हैं, उस असत्य का भय को भी, भगवान अच्युत के चरणकमलों का नित्य उपासना विनाश कर देता है ।

कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वाऽनुसृतः स्वभावम् ।
करोति यद्यत् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयेत् तत् ॥ ११-२-३६ ॥

अपने शरीर, वचन, मनस, इन्द्रिय, बुद्धि और आत्मा को अपने स्वभाव के अनुसार — “ये सब परम भगवान नारायण के लिए” — सोचकर समर्पित करना चाहिए ।

यह श्लोक बहुत प्रसिद्ध है । विष्णु सहस्रनाम के अन्त में पढा जाता है ।

भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्याद् ईशादपेतस्य विपर्ययोऽस्मृतिः ।
तन्माययतो बुधा आभजेत् तमं भक्त्यैकयेशं गुरुदेवतात्मा ॥ ११-२-३७ ॥

भय तब उप्तन्न होता है जब जीवी अपने में मग्न हो जाता है । ईश्वर से विमुख होकर मायाशक्ति द्वारा इस विपर्यास में भगवान को भूल जाता है । इसलिए बुद्धिजीवी एकमात्र भक्ति से गुरु में अंतर्गत देवतात्मा ईश्वर को भजन करना चाहिए ।

“द्वितीय” वह है जो परमात्मा से भिन्न है, यानि जीवात्मा । “अभिनिवेश” होना यानि मग्न होना । अद्वैतवादी यह मानते हैं कि जीवात्मा ही परमात्मा है । इसे “विपर्यय” अर्थात विरुद्ध आलोचना कहा गया है । इस विपर्यास के कारण भगवान कि मायाशक्ति ईश्वर को भूल जाने में विवश करता है । माया से बचना है तो गुरु के शरण लेकर नारायण कि उपासना करना है ।

अविद्यमानोऽप्यवभाति हि द्वयो ध्यातुर्धिया स्वप्नमनोरथौ यथा ।
तत् कर्मसङ्कल्पविकल्पं मनो बुधो निरुन्ध्यादभयं ततः स्यात् ॥ ११-२-३८ ॥

जीवी के बुद्धि उपस्थित को अनुपस्थित मानता है जैसे स्वप्न और आशाएँ का द्वन्द्व । इसी तरह मन भी स्वीकार और निराकार के इन्द्रिय संतुष्टी कर्मों में लगे रहता है । अतः हर बुद्धिजीवी अपने मन का संयम रखने से निर्भय बन जाता है ।

शृण्वन् सुभद्राणि रथाङ्गपाणेः जन्मानि कर्माणि च यानि लोके ।
गीतानि नामानि तदर्थकानि गायन् विलज्जो विचरेदसङ्गः ॥ ११-२-३९ ॥

भगवान श्रीकृष्ण के सर्व मंगलमय जन्म और कर्मों को जिस लोक में सुना जाता है, वहाँ उसके नामों के गुणगान, निर्लज्ज होके, बाह्य जगत में निरासक्त होके, भ्रमण करते हुए, गाया जाता है ।

भगवान वासुदेव को “रथाङ्गपाणि” इसलिए कहते है क्योंकि उसके हाथ में रथ का चक्र था, जब उन्होने भीष्म पितामह के विरुद्ध कुरुक्षेत्र युद्ध में लडे थे ।

खं वायुमग्निं सलिलं महीं च ज्योतींषि सत्त्वानि दिशो द्रुमादीन ।
सरित्समुद्रांश्व हरेः शरीरं यत् किं च भूतं प्रणमेदनन्यः ॥ ११-२-४१ ॥

आकाश – वायु – अग्नि – जल – पृथ्वी नामक पंचभूत, सूर्य – चंद्रमा – तारा इत्यादि प्रकाशमान वस्तुएँ, दश दिशाएँ, पेड़ – पौधें, नदी – समुद्राएँ और सभी भौतिक प्रकृति — ये सब जिस श्रीहरि के शरीर में बसते हैं, उस भगवान को अनन्य भाव से प्रणाम करना चाहिए ।

भक्तिः परेशानुभवो विरक्तिरन्यत्र चैष त्रिक एककालः ।
प्रपद्यमानस्य यथाश्नतः स्युः तुष्टिः पुष्टिः क्षुदपायोऽनुघासम् ॥ ११-२-४२ ॥

परमेश्वर के भक्ति, अपरोक्ष अनुभव और अन्य सब कुछ में विरक्ति — ये तीन एककाल में घटता हैं जो भगवान का शरण लिया है । जिस तरह संतृप्ति, पोषण और भूख मिटाना – ये तीन खाने कि एक एक कौर से बढ़ जाता हैं ।